Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 39, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
निष्कलं सकलं चैव देहस्थं व्योमचारिणम् ।
अरञ्जितं रञ्जितं च नित्यमङ्गाङ्गसंविदम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
निष्कर्षं निकालने पर यानी परमार्थतः कलाशून्य ओर व्यवहारतः कला से युक्त, देह-
स्थित, हृदयाकाश में विचरणशील, परमार्थतः रागशून्य ओर व्यवहारतः रागयुक्त तथा निरन्तर अंग-
प्रत्यंगव्यापी बोधस्वरूप (इस बोधलिंगात्मक परमशिव की पूजा करे ।)