Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verses 8–12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 39, verses 8–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 8-12
संस्कृत श्लोक
आदित्यभावनाभोगभाविताम्बरभास्वरम् ।
शशाङ्कभावनाभोगभावितेन्दुतयोदितम् ॥ ८ ॥
प्रतिभासपदार्थौघनित्यावगतसंविदम् ।
द्वारैर्वहन्तं शारीरैर्मुखे प्राणस्वरूपिणम् ॥ ९ ॥
रसीकृत्य रसं प्राणस्वान्तोदात्ततुरङ्गमम् ।
प्राणापानरथारूढं गूढमन्तर्गुहाशयम् ॥ १० ॥
ज्ञातारं ज्ञेयदृष्टीनां कर्तारं सर्वकर्मणाम् ।
भोक्तारं सर्वभोज्यानां स्मर्तारं सर्वसंविदाम् ॥ ११ ॥
सम्यक्संविदिताङ्गौघं भावाभावनभावितम् ।
आभासभास्वरं भूरि सर्वगं चिन्तयेच्छिवम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
कोई यज्ञ प्रिय नहीं है) यह जो कहा है, उससे भी विरोध होगा । इसी प्रकार शारीरक भाष्य में
भगवान् भाष्यकार ने “इतरकर्मिणाम् धूमादिमार्गेण चन्द्रमण्डलप्राप्तिरेव, अश्वमेधयाजिन एकस्य
त्वर्चिरादिमार्गेण ब्रह्मलोकावाप्तिः* इत्यादि सिद्धान्त किया है । अतः यह सिद्ध हुआ कि राजसूय की
अपेक्षा अश्वमेध का फल अधिक है । तो उस पर यही समाधान किया जा सकता है कि बाद में कहे
गये फल से पूर्व में कहे गये फल का बाध नहीं होता । इसलिए उपर्युक्त सभी वचनों की संगति लग
सकती है । सारांश यह है कि जहाँ आधी घड़ी पूजन से हजार अश्वमेध यज्ञँ का फल होता है, वहाँ
एक घड़ी भर पूजन करने से उससे दुगुना यानी दो हजार अश्वमेघों का फल तो प्राप्त ही है ओर
वहाँ राजसूय का स्वाराज्य-प्राप्तिरूप फल यदि कहा गया हो, तो वह इतर अश्वमेधयाजियोँ के
ऊपर स्वाराज्य-प्राप्ति मेँ पर्यवसित होता है । उससे तो जैसे प्रजाओं से राजा को भोग अधिक
प्राप्त होता है, वैसे ही घटिकालपूजक का भोगोत्कर्ष ही सिद्ध होता है । इस पर शंका हो कि यहाँ
^तक्रकौण्डिन्य' न्याय का आश्रयण करेगे तो वह भी ठीक नहीं, क्योकि वाक्य व्यर्थ हो जायेगा ।
ऐसी परिस्थिति में महाभाष्य में कहा है कि निश्चय ही संभव न होने पर सामान्य का विशेष से बाध
होता है और यदि संभव हो तो दोनों ही होंगे “असति खल्वपि संभवे बाधनं भवति अस्ति च संभवो
यदुभयं स्यात्“ । यहाँ पर “अपच्छेदाधिकरण” न्याय का भी अवसर नहीं हो सकता, अदक्षिणत्व
और सर्ववेदसदक्षिणत्व की तरह ब्रह्मलोक और वहाँ का स्वाराज्य इन दो फलों में परस्पर विरोध
नहीं है, यही विशेष सूचित करने के लिए प्रस्तुत श्लोक में “तु ” शब्द दिया गया है ।
(७) पद्मासन आदि आसन लगाकर स्थित हुई तथा सामने हाथ फैलाकर बद्धांजलि हुई यह देह
शिवलिंग के आकार की हो जाती है, यह प्रसिद्ध है ।
उस प्रकार के पूजन में यदि मन अन्धकार में वता हो, तो बाहर एवं भीतर सारे आकाश में व्याप्त
अखण्डित और अद्वितीय आदित्यमण्डल की अपने में भावना कर लेनी चाहिए और यदि सन्तापर्मे वह
(मन) इवता हो, तो सम्पूर्ण आकाशमण्डल मे उदित अखण्डित तादश चन्द्रमण्डल की अपने में भावना
कर लेनी चाहिए, यह कहते हैँ ।
अपने मेँ आदित्यमण्डल की भावना करने के कारण कल्पित विस्तार से यानी विस्तृत अपने अवयव
संस्थान से परिपूर्णं हृदय और बाह्य आकाश में देदीप्यमान, चन्द्रमण्डल की अपने में भावना करने के
कारण कल्पित विस्तृत अपने अवयव संस्थान से परिपूर्ण उक्त आकाश मेँ चन्द्ररूप से उदित हुए, बाह्य
एवं आभ्यन्तर बुद्धिवृत्तिरूपी प्रतिभासो ओर उनसे प्रतिभासित हुए पदार्थसमूहों में अनुस्यूतरूप से
निरन्तर अनुभूत हो रहे संविदात्मक ज्ञानरूप, शरीर के मुख आदि द्वारो से बाहर विषय-प्रदेशों में
अपने आभासो को प्राप्त करानेवाले, मुख मे प्राणस्वरूप, शब्द आदि विषयों को अपने आनन्दरूपी रस
से ही मधुर बनाकर मानों स्वाद ले रहे, प्राण एवं मन रूपी दो उत्कृष्ट घोड़ों से युक्त, प्राण एवं अपानरूपी
रथ पर आरूढ, अन्दर से अत्यन्त गूढ, हृदयरूपी गुहा में अवस्थित, ज्ञातव्य ज्ञानो के ज्ञाता, सम्पूर्ण
कर्मो के कर्ता, सम्पूर्ण भोज्य पदार्थो के भोक्ता और समस्त ज्ञानो के स्मर्ता परम शिव का जिसने कि
"यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्र क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥” (00) भगवान्
द्वारा कही गई इस रीति से सम्पूर्ण अंग समूहों का भली प्रकार ज्ञान कर लिया है, जो विषयों की भावना
ओर अभावना से लक्षित है, सम्पूर्णं प्रकाशो से भी अधिक प्रकाशरूप है तथा सर्वव्यापी है - ध्यान
करे