Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 39, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
गच्छतस्तिष्ठतश्चैव जाग्रतः स्वपतोऽपि च ।
सर्वाचारगता पूजा नित्यं ध्यानात्मिका त्वियम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
यह पूजा भी ध्यानात्मिका
ही है और जा रहे, बैठ रहे, जाग रहे तथा सो रहे पुरुष के सभी व्यवहारो मे सर्वदा अनुगत है