Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 39, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
दैवत्वपरिपूर्णोऽन्तरदीनात्मावतिष्ठते ।
नास्तमेति न चोदेति न तुष्यति न कुप्यति ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
उस पूजा परिपाक के फल बतलाते है।
महर्ष, वह पूजक न तो अस्त होता है और न उदित ही होता है । वह न तो सन्तुष्ट होता है ओर न
क्रुद्ध ही होता हे । वह न तो तृप्ति को प्राप्त होता है और न क्षुधित ही होता है । वह न कुछ चाहता है और
न कुछ छोड़ता ही है