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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verses 27–28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 39, verses 27–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 27,28

संस्कृत श्लोक

न तृप्तिं न क्षुधं याति नाभिवाञ्छति नोज्झति । समः समसमाचारः समाभासः समाकृतिः ॥ २७ ॥ सौम्यतामलमायातः समन्तात्सुन्दराशयः । आदेहमेक एवासावव्युच्छिन्नमहामतिः ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

भीतर सम ओर बाहर जीवन्मुक्तो के समान आकारवाला, सब प्राणियों के चित्त में “मेरा ही यह प्रिय है" यों एकरूप से अवभासमान, निर्विकार होने से सर्वदा समान आकृति से युक्त अतएव भली प्रकार जीवन्मुक्त-दशा को प्राप्त हुआ, चारों ओर सुन्दर आशय से शोभित ओर अद्वितीय ही यह जीवात्मा देहपातपर्यन्त अखण्ड तत्त्वज्ञान से युक्त होता हुआ चिरकाल तक रात- दिन यह देवपूजन करता ही रहता हे