Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 39, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
यथाप्राप्तक्रमोत्थेन सर्वार्थेन समर्चयेत् ।
मनागपि न कर्तव्यो यत्नोऽत्रापूर्ववस्तुनि ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
ओर अनायास प्राप्त सम्पूर्ण
त्रिपुटीरूप (ज्ञाता, ज्ञेय ओर ज्ञानरूप) वस्तु से सम (रागादिशून्य) एवं सम्पूर्ण (सम्पूर्ण इन्द्रियों से
जन्य) ज्ञान के द्वारा इन्द्रियों की वृत्तियों मे प्रतिबिम्बित चैतन्य से पर यानी उसके बिम्बभूत चैतन्यमात्ररूप
उस देव की वह (जीवात्मा) पूजा करता हे ॥ ३ ०॥ जैसे-तैसे प्राप्त व्यापारों से सिद्ध बाह्य एवं आभ्यन्तर
वस्तुओं से उसकी भलीभाँति पूजा करनी चाहिए। इस देवपूजा में गन्ध, पुष्प आदि वस्तुओं को जुटाने
के लिए किंचित् भी प्रयत्न नहीं करना चाहिए