Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verses 4–6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 39, verses 4–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 4-6
संस्कृत श्लोक
शयानमुत्थितं चैव व्रजन्तमथवा स्थितम् ।
स्पृशन्तमभितः स्पृश्यं त्यजन्तमथवाऽभितः ॥ ४ ॥
भुञ्जानं संत्यजन्तं च भोगानाभोगपीवरान् ।
बाह्यार्थपरिकर्तारं सर्वकार्यस्वरूपदम् ॥ ५ ॥
देहलिङ्गेषु शान्तस्थं त्यक्तलिङ्गान्तरादिकम् ।
यथाप्राप्तार्थसंवित्त्या बोधलिङ्गं प्रपूजयेत् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
सो रहे अथवा जागे हुए, जा रहे अथवा बैठे हुए
और चारों ओर स्पर्श आदि विषयों का उपभोग कर रहे अथवा उद्वेग के कारण उन्हें छोड रहे; विपुलता
ओर जडता से पूर्ण भोगों का उपभोग कर रहे या उनका त्याग कर रहे, अपने अध्यारोप द्वारा जाग्रत्
आदि विषयों का निर्माण करनेवाले,समस्त कार्यो मे अपनी सत्ता देनेवाले ओर देहस्वरूप (७) लिंगों में
मिट्टी, लकड़ी, शिला आदिरूप विभिन्न लिंगान्तर आदि अन्य स्वरूपो का परित्याग कर विक्षेपरहित
स्वरूप से अवस्थित हुए चैतन्यस्वरूप लिंग की प्रारब्ध के अनुसार प्राप्त हुई अर्थज्ञानरूप सामग्री से
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