Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verses 54–55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 39, verses 54–55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 54,55
संस्कृत श्लोक
आत्मार्चनविधानेऽस्मिन्प्रोक्ता द्रव्यश्रियस्तु याः ।
एकेनैव समेनैता रसेन परिभाविताः ॥ ५४ ॥
नाम्लानकट्व्यो नो तिक्ता न कषायाश्च काश्चन ।
चित्रैरपि रसैर्दिग्धा मधुरा एव ताः किल ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि विचित्र दुःख, राग, द्वेष आदि विकारों की हेतुभूतः मधुर, खटी, कट, तिक्त आदि
विषम-रसोवाली भोग्य-द्रव्यरूपी लक्षिमयों का किसी प्रकार के विकार के विना आत्मा किसी प्रकार
ग्रहण कर सकता है ? तो इसका समाधान यह है कि एक समरस से ही सभी में विषमता का निरासकर
मधुरता बनाकर ही आत्मा उनका ग्रहण कर सकता है, इस आशय से कहते हैं।
महर्षे, इस आत्म-पूजा के विधान में जो द्रव्यसम्पत्तियाँ बतलाई गई हैं, वे सब एकमात्र समतारूप
रस से भरी जानेपर न कोई खडी होती हैं और न कड़वी होती हैं, न तिक्त होती हैं और न कसेली ही
होती हे । ऐसी स्थिति में परस्पर विरुद्ध चित्र-विचित्र रसों से भरी हुई भी वे मधुर रसवती ही हो जाती
हैं, यह आप निश्चित जानिए