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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verse 57

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 39, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 57

संस्कृत श्लोक

समतामृतरूपेण यद्यन्नाम विभाव्यते । तत्तदायाति माधुर्यं परमिन्दोरिव च्युतम् ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

समतारूप अमृत से जो-जो भावित होता है, वह सब, चन्द्रमा से टपके हुए अमृत की नाई, परम मधुरता को प्राप्त होता है