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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verse 58

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 39, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 58

संस्कृत श्लोक

समताकाशवद्भूत्वा यत्तु स्याल्लीनमानसम् । अविकारमनायासं तदेवार्चनमुच्यते ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मैक्यदर्शनस्वरूप समता से स्वयं आकाश की तरह विकारशून्य होकर मन के लयपूर्वक जो अनायास अवस्थिति है, वही मुख्य देवार्चन कहा जाता हे