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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 4, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 4, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

अध्यात्मशास्त्रमन्त्रेण तृष्णाविषविषूचिका । क्षीयते भावितेनान्तः शरदा मिहिका यथा ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

भली प्रकार विचारित अध्यात्मशास्त्ररूपी मंत्र से तृष्णारूपी महामारी ऐसे क्षीण हो जाती है, जैसे शरतकाल से तुषार क्षीण हो जाता है