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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 40, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 40, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 40 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

ईश्वर उवाच । यथाकालं यथारम्भं न करोषि करोषि यत् । चिन्मात्रस्य शिवस्यान्तस्तदेवार्चनमात्मनः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मज्ञानी द्वारा विहित ओर अविहित सभी प्रकार के कर्म शिवार्चनरूप ही हैं, यह कहते है। ईश्वर ने कहा : महर्षे, यथा समय ओर यथा शक्ति तुम जो भी कुछ कर्म करते हो अथवा नहीं भी करते, वह चैतन्यमात्रस्वरूप शिवात्मक आत्मा का अन्तःपूजन है

सर्ग सन्दर्भ

उनतालीसवाँ सर्ग समाप्त चालीसवाँ सर्ग पूज्य, पूजक एवं पूजा आदि विकल्पों से शून्य, शिवस्वरूप, शुद्ध पूर्ण चिदात्मा ही देवताओं में सार है यह वर्णन ।