Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 40, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 40, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 40 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
अधिगतवति साधौ चैकमेवानुरूपं त्वयि तरलितजीवे जन्मदुःखादि किंचित् ।
न लगति परिशून्ये सर्वतः स्फाटिकाङ्गे नवसदन इवाङ्के निष्कलङ्के कलङ्कः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुने, जहाँ
सब अंगों में स्फटिक शिलाएँ जडी गई हैं तथा पास में चारों ओर नील, रक्त आदि दूसरी कोई भी
वस्तुएँ हैं ही नहीं, ऐसे नवीन मकान में प्रतिबिम्ब या लेप दोनों तरह से जैसे नील आदि रंगों से कलंक
नहीं लगते, वैसे ही जिसने शोधन के द्वारा देह से पृथक् जीव समझ रक्खा है, ऐसे अमानित्व आदि
गुणों से युक्त, अतएव अनुरूप द्वितीय अपने तत्त्व को (स्वस्वरूप के) ऊपर कहे गये पूज्य,
पूजक आदि तत्त्व के विमर्श के साथ पहचान लेनेवाले, मायाकलंक से वर्जित और सर्वतः माया के
कार्यरूप प्रपंच से शून्य आपमें जन्म आदि के कोई कलंक लगते ही नहीं