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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । शिवः किमुच्यते देव परंब्रह्म किमुच्यते । आत्मा किमुच्यते नाथ परमात्मा किमुच्यते ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

“नेश्वरस्या55कृतेब्रह्मन्‌ व्यपदेशो हि युज्यते” (यो.नि.४०।११) इत्यादि से जव पूज्यतत््व नीरूप ओर अव्यपदेश्य कहा गया है तब उसका “शिव” आदि शब्दो से भला कैसे व्यपदेश (निरूपण) हो सकता है ? इस आशय से पूछते हैं। महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे देव, यदि शिव आदि शब्दों के प्रवृत्तिनिमित्तक किसी धर्म का वह (पूज्यतत्त्व) स्पर्श ही नहीं करता तो फिर “शिव” यह नाम किस निमित्त से कहा जाता है एवं परब्रह्म इत्यादि शब्द भी किस निमित्त से कहे जाते हैं ? हे नाथ, आत्माशब्द कैसे कहा जाता है और परमात्मा कैसे कहा जाता है ?

सर्ग सन्दर्भ

चालीसवाँ सर्ग समाप्त इकतालीसवाँ सर्ग शास्त्र एवं आचार्य आदि की सफलता, नामभेदों की कल्पना, अध्यारोप का क्रम और तदनन्तर अपवाद इन सबका वर्णन ।