Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
पश्यत्यात्मानमात्मैव विचारयति चात्मना ।
आत्मैवेहास्ति नाविद्या इत्यविद्याक्षयं विदुः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि जब बुद्धि से आत्मा का विचारकर निश्चय किया जाता है, यह आप स्वीकार
करते हैं तब आत्मा में बुद्धि दृश्यता क्यो नहीं है यानी आत्मा बुद्धि से ग्राह्य क्यो नहीं है ? तो यह कहना
ठीक नहीं, क्योकि विचार आदि करने में जड़स्वरूप बुद्धि स्वतंत्र नहीं है, किंतु आत्मा ही बुद्धिआदिरूप
उपायों से विचार आदि द्वारा अविद्या का बाध करके स्वयं ही प्रकाशित हो जाता है, यही कहते हैं।
आत्मा ही आत्मा को देखता है और आत्मरूप से उसका विचार करता है। इस संसार में एकमात्र
आत्मा ही विद्यमान है, न कि अविद्या, इसे ही अविद्या का क्षय कहते हैं