Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
कर्मबुद्धीन्द्रियाद्यन्तसुखदुःखादिसंक्षये ।
शिव आत्मेति कथितस्तत्सदित्यादिनामभिः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
यही कारण है कि परमानन्दस्वरूप यह आत्सदेव, जिसने अपने बोध से सम्पूर्ण अमंगलों का
नाश कर दिया है, अतएव शिव शब्द के योग्य है, प्रवृत्तिनिमित्त सापेक्ष नहीं ऐसा पहले कहा गया
है, यह कहते हैं ।
कर्मेन्द्रिय, बुद्धीन्द्रिय आदि का नाश तथा सुख, दुःख आदि का क्षय होने पर "तत्, 'सत्' इत्यादि
नामों से शिवस्वरूप आत्मा ही कहा गया है