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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

गुरुशास्त्रार्थशिष्याणां चिरसंयोगसत्तया । अहनीव जनाचार आत्मज्ञानं प्रवर्तते ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

गुरु, शास्त्रार्थ और शिष्यों के चिर संयोग की सत्ता से, दिन में लोगों के आचार की नाई, आत्मज्ञान प्रवृत्त होता हे