Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
एवं देवार्चनं नित्यं ज्ञः कुर्वन्मुनिनायक ।
यत्रास्मदादयो भृत्यास्तत्प्रयान्ति परं पदम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुनिनायक, इस प्रकार
देवार्चन कर रहा ज्ञानी पुरुष उस परमपद में पहुँच जाता है, जिस परम शिवपद में एक-एक गुण के
अभिमानी हम सभी अनुचरो की तरह सृष्टि आदि कर्मों में लगाये गये हैं