Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verses 32–34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verses 32–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
ताभिः संवलिता सैव सत्ता जीवाभिधानिका ।
भवति स्पन्दविज्ञाना पवनस्येव लेखिका ॥ ३२ ॥
जीवशक्तिस्तथाभूता निश्चयैकविलासिनी ।
बुद्धितामनुयाता सा भवत्यज्ञपदे स्थिता ॥ ३३ ॥
शब्दशक्त्या क्रियाशक्त्या ज्ञानशक्त्यानुगम्यते ।
प्रत्येकं प्रस्फुरत्यन्तरप्रदर्शितरूपया ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
देश
और काल की कल्पनाओं से संवलित वही चित्सत्ता “अहम्” इत्याकारक अभिमान में हेतुभूत संस्कारों
के उद्बोध से स्पन्दन और विज्ञान से युक्त होती हुई वायुलेखा के सदृश आभ्यन्तर प्राणस्पन्द-
शक्ति से युक्त होकर "जीव" संज्ञावाली हो जाती है