Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
मिलित्वैष गणः क्षिप्रं स्मृतिं समनुकूलयन् ।
मनो भवति भूतात्मबीजं संकल्पशाखिनः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह निश्चय के संस्कारो का उद्वोध होने पर बुद्धि आदि शब्दों की वाच्य भी वही शक्ति होती
है, यह कहते हैं।
उस प्रकार की जीवशक्ति ही एकमात्र निश्चयरूप विलासवाली होकर बुद्धिरूपता का अनुसरण
करती हुई अज्ञपद में स्थित हो जाती है ॥ ३ ३॥ तदनन्तर कायिक, वाचिक और मानसिक व्यवहारों के
संस्कारों के उद्बोध से तात्त्विक आत्मस्वरूप को बिलकुल छिपा रखनेवाली शब्दशक्ति, क्रियाशक्ति
और ज्ञानशक्ति (~) ये तीनों ही शक्तियाँ अहन्ता का अनुगमन करती हैं यानी अहन्ता के पीछे-पीछे
दौड़ती फिरती हैं, जिनमें प्रत्येक का हृदय के अन्दर स्फुरण हुआ करता है॥ ३ ४॥ यह पूर्वोक्त अहंकारादि
समूह शब्दशक्ति आदि से अनुगत होकर शीघ्र स्मरणशक्ति की भलीभाँति कल्पना करता हुआ
संकल्परूपी वृक्ष का बीजभूत, पंचभूतात्मक मन बन जाता है