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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यदिन्द्रियाणां बुद्ध्यादियुक्तानामप्यदृश्यताम् । गतं तत्कथमीशान त्वशङ्केनोपगम्यते ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे ईशान, जो बुद्धि आदि से युक्त चक्षु, श्रोत्र आदि बाह्य इन्द्रियों की भी दृष्टि के बाहर चला गया है, उस परम ब्रह्म का अशंक (उपाय के असंभव की आशंका से रहित) अधिकारी द्वारा कैसे साक्षात्कार किया जाता हे ? तात्पर्य यह है कि बुद्धि से भी गम्य न होने के कारण जिसके परिज्ञान में कोई उपाय ही नहीं है, उस ब्रह्म का सद्रूप होने पर परिज्ञान कैसे होगा ?