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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verses 5–6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 5,6

संस्कृत श्लोक

ईश्वर उवाच । यो मुमुक्षुरविद्यांशः केवलो नाम सात्त्विकः । सात्त्विकैरेव सोऽविद्याभागैः शास्त्रादिनामभिः ॥ ५ ॥ अविद्यां श्रेष्ठया श्रेष्ठां क्षालयन्निह तिष्ठति । मलं मलेनापहरन्युक्तिज्ञो रजको यथा ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

ईश्वर ने कहा : हे महर्षे, (प्रमाणजन्य शुद्ध सात्विकभाग की परिणामस्वरूप जो ब्रह्माकारवृत्ति है, वह अविद्या का आवरण दूर कर देती है । अविद्या का परदा हट जाने पर तो स्वप्रकाशस्वरूप होने से ही ब्रह्म तत्वतः प्रकाशित होने लग जाता है । वही इसका साक्षात्कार है, बुदिवृत्ति में अभिव्यक्त विद्व्याप्तिरूप नहीं |) जो मोक्ष की चाह रखनेवाला मनःस्वरूप, शम, दम आदि साधन से परिशुद्ध होने के कारण केवल सात्त्विक अविद्यांश है, वह सत्‌शास्त्र, सदगुरु ओर सत्संग आदि नामधारी सात्विक ही अविद्या-विभागों से सम्पादित श्रवण, मनन एवं निदिध्यासन से लेकर साक्षात्कारपर्यन्त अपनी वृत्ति-परम्परा से अनेक जन्मों के संचित यज्ञ दान आदि सुकृतो का संभार होने के कारण श्रेष्ठ स्वकार्यस्वरूप अविद्या का क्षालन करता हुआ इस संसार में चिरकाल तक उस तरह स्थित रहता हे, जिस तरह युक्तिज्ञ (कपड़ा धोने में अत्यंत कुशल) धोबी मल से मल का अपहरण करता हुआ यानी गदहों की लीद, रेह (खाद युक्त मिट्टी) आदि से गन्दे कपड़ों को साफ करता हुआ संसार में स्थित रहता है