Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
संवेदनात्परिज्ञानाच्छिवतामेव गच्छति ।
अज्ञातमेव वा यत्तत्कथं गच्छति वस्तुताम् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
इसका ज्ञान होने पर इसमें वस्तुरूपता होगी या इसका ज्ञान न रहने पर वस्तुरूपता होगी ? दोनों
तरह से भी नहीं हो सकेगी, ऐसा कहते है ।
संवेदन से यानी यथार्थ परिज्ञान से सब दृश्य जगत् शिवरूपता को ही प्राप्त हो जाता है । जो
ज्ञात है ही नहीं, वह वस्तुरूपता को कैसे प्राप्त करेगा