Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
जीवदेतदवस्थाकं स्थितं पश्यति देहकम् ।
असन्तमेव गन्धर्वपुरं स्वप्रनरं यथा ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
इस अवस्था मेँ स्थित हुए जीवन धारण कर रहे इस असत् तुच्छ शरीर को, असत् ही स्वप्नावस्था
के मनुष्य और गन्धर्वनगर की नाई, देखता रहता है