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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 51

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 51

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । गन्धर्वनगराकारमपि स्वप्ननरोपमम् । जगद्दुःखाय दुःखस्य कात्र युक्तिः परिक्षये ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

“यह सारा संसार मिथ्या है" ऐसा ज्ञान होने पर भी यह जगत्‌ दुःख पैदा करता रहता ही है, इसलिए दुःख की औषधि मिथ्याज्ञान के सिवा कोई दूसरी ही बतलानी चाहिए, यह मान रहे महाराज वस्रिष्ठजी पूछते हैं । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भगवन्‌, यह जगत्‌ भले ही गन्धर्वनगर के आकार का हो तथा इसकी उपमा भले ही स्वप्न के नर से दी जाय, फिर भी दुःख के लिए उपस्थित तो है ही । इसलिए दुःख के परिक्षय के लिए यहाँ कौन-सी युक्ति है ?