Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
सद्रष्टरि तु साहन्ते समनोमननादिके ।
अविद्यमाने जगति यत्सत्तत्परिदृश्यते ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
द्रष्टा के सहित, अहन्ता से
युक्त और मन तथा मनन आदि के साथ इस जगत् का परिशेष में जब अस्तित्व ही नहीं रहता तब
जो सद्वस्तु है, वही अवशिष्ट रह जाती है