Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
यत्र नो वासना नैव वासको नैव वास्यता ।
केवलं केवलीभावः संशान्तकलनभ्रमः ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ पर न तो कोई वासना रहती है, न कोई
वासक रहता है और न कोई वासना का विषय (वास्य) ही रहता है। किंतु एकमात्र केवलीभाव यानी
चिन्मात्रस्वभाव ही रहता है, जिसमें कि कलना का भ्रम भलीभाँति शांत हो चुका है