Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 42, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
न देशकालक्रमणं करोति च मनागपि ।
यथा संकल्पशैलेन देशकालाद्यनन्तकम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
तव सर्ग में देश एवं काल दोनों से आक्रान्तत्व का अनुभव कैसे होता है ? इस पर कहते हैं।
जैसे संकल्पमय पर्वत से असीम देश, कालादि आक्रान्त होने पर भी वास्तव में वे आक्रान्त नहीं
कहे जा सकते, वैसे ही व्यावहारिक सत्ता से युक्त इस जगत् से देश, काल आदि के आक्रान्त होने
पर भी वे वास्तव मेँ आक्रान्त नहीं कहे जा सकते