Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 42, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
यथोच्चैर्देशकालादि तथैव जगता सता ।
संपद्यते यथा योऽसौ पुरुषः सर्वकारकः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीसे संकल्प के अनुसार ही पुरुष, कीट, स्थावर आदि जन्मवैचित्र्य होता है, ऐसा कहते हैं।
एेहिक ओर आमुष्मिक सभी क्रियाओं में समर्थ जो यह पुरुष है, वह जिस क्रम से उत्पन्न होता है,
उसी क्रम से यहाँ क्षण में कीट भी हो जाता है