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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 42, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

अनेनैव क्रमेणेह कटिः संपद्यते क्षणात् । तस्थुषामेवमेवेह जातयो हि चतुर्विधाः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

उसी प्रकार इस ब्रह्माण्ड मे स्थावरो की योनिर्योँ भी उत्पन्न होती हैं, उसी प्रकार अण्डज आदि चार प्रकार की जातियाँ ओर रुद्र से लेकर तृणपर्यन्त सभी पदार्थ मायाधिष्ठाता के संकल्पकाल में उत्पन्न हो जाते हैं