Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 42, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
तदनाद्यवभासात्म ब्रह्मशब्देन गीयते ।
अस्मिन्प्रौढिं गते सर्गे महाचिद्द्योतनं न च ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
अभिमान की अभिवृद्धि से उत्तरोत्तर ज्यो-ज्यो सृष्टि प्रौढ़ बनती जाती है, त्यो -त्यो चिदात्मा के
प्रकाश का हास और भेदाधिक्य से उत्पन्न क्षुद्रता आत्मा में प्राप्त होती जाती है, यो कहते है ।
इस सर्ग के प्रौढ हो जाने पर महाचैतन्य का प्रकाश नहीं होता ओर मिथ्याभूत देश ओर काल से
जनित परिच्छेदो से आत्मा में मशकपर्यन्त महान् सूक्ष्मता ओर क्षुद्रता प्राप्त हो जाती हे