Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 42, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
सर्वगत्वाच्चिद्धनस्य कार्यं स्वप्ननरोऽपि हि ।
यथा करोत्याशु तथा जीवोऽद्यापि शरीरधृक् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
कथित दृष्टान्त के आशय का ही पुनः विवरण करते हैं।
जैसे आज भी स्वप्नमनुष्य चैतन्यघन आत्मा के सर्वत्र व्यापक होने से ब्रह्माण्डरूप कार्य करता है,
वैसे ही शरीरधारी जीव भी ब्रह्माण्डरूप कार्य करता है