Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 42, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
सनातनोऽहमव्यक्तः पुमानित्यभिधां ततः ।
करोत्यात्मनि तेनाशु प्रथमः प्रथितः पुमान् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
आदि सर्ग में वही जीव समष्ट्यात्मक उपाधि से युक्त होकर हिरण्यगर्भ नाम धारण कर अपने में
और बाहर की वस्तुओं में नामभेदों का भी व्यपदेश (निरूपण) करता है, यह कहते हैं ।
इसके बाद वह मैं सनातन अव्यक्त "पुरुष" हूँ, इस प्रकार पुरुष-नाम का अपने ही स्वरूप में
निर्माण करता है और उसी से प्राथमिक पुरुष के रूप में शीघ्र प्रकाशित होता है