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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 42, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

एवं स सर्गे कस्मिंश्चित्प्रथमोऽथ सदाशिवः । कस्मिंश्चिद्विष्णुरित्युक्तो नाभ्युत्पन्नः पितामहः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

वही सात्विक, राजस ओर तामस कल्पो मे सदाशिव आदि मूर्तियों की पहले कल्पना कर फिर दूसरों की कल्पना करता है, ऐसा कहते हैं । इस प्रकार वही जीव किसी सर्ग में पहला पुरुष सदाशिव होता है, बाद में किसी सर्ग में विष्णु तो किसी तीसरे सर्ग में विष्णु की नाभि से उत्पन्न ब्रह्मा कहा जाता है