Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 42, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
पितामहः स कस्मिंश्चित्कस्मिंश्चिदपि चेतरः ।
स च संकल्पपुरुषः संकल्पान्मूर्तिमास्थितः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
"आकाशप्रभवो ब्रह्मा“ (ब्रह्मा आकाश से उत्पन्न होता है) इस पूर्व रामायण की उक्ति से पितामह
नाभि से ही उत्पन्न होता है, यह कोई नियम नहीं है, इस आशय से कहते हैं।
किसी सर्ग में वह पितामह कहा जाता है तो किसी सर्ग में दुर्गा, भैरव, विनायक आदि कहा जाता
है, परंतु वह सदाशिव आदि पुरुष संकल्पमय है यानी “सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय! इस श्रुति में
उक्त मायिक संकल्परूप है ओर संकल्प से ही आकार प्राप्त करता है