Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 43, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
दुःखे महति संप्राप्ते धनबन्धुवियोगजे ।
एतां दृष्टिमवष्टभ्य विचारं कुरु सुव्रत ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
छोड़ी गई आसक्ति पुनः उत्पन्न न होने में विचार की दढता ही हेतु है, यह कहते हैँ ।
हे सुव्रत, धन और बन्धुओं के वियोग से जनित असीम दुःख के प्राप्त होने पर इस दृष्टि का
अवलम्बन कर आप विचार कीजिए