Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 43, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
इति चिच्चक्रचाञ्चल्ये चिन्मये जगदम्बुधौ ।
तरङ्गजाले चाम्भोधौ कः क्रमो हर्षशोकयोः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त रीति से चिन्मय जगत्-
सागर में चिद्रूप जगदात्मक चक्र की चंचलता होने पर और समुद्र में तरंगसमूह होने पर हर्ष और शोक
का प्रसंग ही क्या ?