Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 43, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
तात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत् ।
अतस्तव कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे तात, आप चिन्मात्रस्वरूप हैं, यह जगत् आपसे पृथक् नहीं है इसलिए आपको
किस प्रकार और कहाँ हेय ओर उपादेय की कल्पना होगी ?