Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 43, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
त्वमिहासि जगद्रूपं चिन्मात्रवितताकृते ।
निजावयवकावृत्तौ कः क्रमो हर्षशोकयोः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि आप जगत् की तुच्छता नहीं चाहते, तो (आत्मा ही जगत् है” यह भावना कीजिए । वैसा करने
से भी बन्धु आदि का वियोग होने पर अपने अवयव परिवर्तन की नाई आपमें हर्ष ओर शोक की प्रवृत्ति
नहीं होगी, ऐसा कहते हैं।
चिन्मात्रस्वरूप विशाल आकृतिवाले श्रीरामभद्र, यहाँ आप जगद्रूप ही हैं, ऐसा अनुभव कीजिए।
ऐसा अनुभव करने पर भी आपको अपने अवयवों के परिवर्तन की नाईं हर्ष और शोक का प्रसंग ही
क्या है ?