Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 43, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
ज्ञातं ज्ञातव्यमखिलं जाता तृप्तिरकृत्रिमा ।
न मुनेऽस्ति मलं द्वित्वं न चेत्यं न च कल्पनम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुने, अब मुझमें न अज्ञान है, न जीव और ब्रह्म का भेद है, न
चेत्य है ओर न मन ही हे । पहले मुझमें जो अज्ञान था, वह इस समय नष्ट हो गया