Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 43, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
निराकाङ्क्षी स्थितोऽस्म्यन्तः सुमेरुः कनकेष्विव ।
न तदस्त्यस्ति यत्राशा न तदस्ति यदीप्सितम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज, जिस प्रकार सुमेरुपर्वत सुवर्णो की अभिलाषा न करता हुआ स्थित रहता है, उसी प्रकार
साधुओं द्वारा समीप में आये हुए शिष्यो को कहे गये सभी तरह से साधनोपदेशं की भीतर आकांक्षा न
करता हुआ मैं भी स्थित हूँ २६॥ चराचरात्मक इस संसार में ऐसी कोई चिरलभ्य वस्तु नहीं है, जिसकी
मुझे इच्छा हो, ऐसी कोई अनुपलभ्य वस्तु नहीं है, जिसकी मुझे अभिलाषा हो, ऐसी कोई वस्तु नहीं हे,
जो मेरे लिए हेय ओर उपादेय हो ओर ऐसी भी कोई वस्तु नहीं है, जो उपेक्ष्य ही हो