Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 43, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 43, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 43 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
यथाप्राप्तैः क्रियाचारकुसुमैरात्मनोऽर्चनम् ।
व्युच्छिन्नमपि व्युच्छिन्नं न कदाचिदहर्निशम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
। जाग्रत्-कालमें दिन -रात समयानुसार प्राप्त हुए क्रियाचाररूप कुसुमों से आत्मा
का पूजन करता हूँ। सुषुप्ति-काल में वह उच्छिन्न हुआ प्रतीत होने पर भी वास्तव में किसी भी समय
वह उच्छिन्न हुआ ही नहीं है, क्योंकि सुषुप्ति-काल में भी "सुखमहमस्वाप्सं न किंचिदवेदिषम्” उठने
के बाद हुए इस स्मरण की हेतु अविद्यावृत्तिरूप पुष्प से अर्चन हो सकता ही है