Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 44, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
यां यां वस्तुदृशं यासि तस्यां तस्यामवस्थितम् ।
सत्तासामान्यरूपेण ब्रह्म बृंहितचिद्धनम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
हम मनोरथ के विनाश से निराशत्व आदि की अभिलाषा नहीं करते, किंतु चारों ओर से निरतिशय
आनन्दरूप ब्रह्म के लाभ से उनकी आशा करते हैं, इस आशय से कहते हैं।
जिस-जिस वस्तुदृष्टि की ओर आप जाते हैं, उस-उस वस्तुद्ृष्टि में सामान्यसत्तास्वरूप से
वृद्धिगत चिद्घनरूप ब्रह्म अवस्थित है