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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 44, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

आशा यातु निराशत्वमभावं यातु भावनम् । अमनस्त्वं मनो यातु तवासङ्गेन जीवतः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, अनासक्ति से जी रहे आपकी आशा निराशा में परिणत हो जाय, भावना अभावना में परिणत हो जाय और मन अमनोरूप में परिणत हो जाय