Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 44, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
ज्ञाता ज्ञानं तथा ज्ञेयं त्रयमेकतयात्मनि ।
शान्तात्मानुभवाऽभव्यं न भूयो भवभागसि ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
शान्तात्मा होकर आप
ज्ञाता, ज्ञान तथा ज्ञेयरूप इन तीनों को और दुःख आदि को भी उक्त त्रिपुटी मेँ एकीकरण कर एकात्मरूप
से अपनी आत्मा में अनुभव कीजिए । इससे आप (उनकी प्रतिकूलता नष्ट हो जाने के कारण) फिर
संसार के भागी नहीं होंगे