Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 44, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
वासनारहितैरन्तरिन्द्रियैराहर क्रियाः ।
न विक्रियामवाप्नोषि खवत्क्षोभशतैरपि ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे रामभद्र,
आप भीतर से वासनारहित इन्द्रियों द्वारा व्यावहारिक क्रियाएँ कीजिए । एेसा करने से आप सैकड़ों
विक्षोभों के प्राप्त होने पर भी आकाश की नाई विकार को प्राप्त नहीं होगे