Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 44, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
यथा वातरजःसङ्गस्पन्दात्खं भाववेदनम् ।
तथा चितश्चेत्यतया स्पन्दादिदमुपस्थितम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
“वित्तोन्मेषनिमेषाभ्याम्“ इससे जो अर्थ कहा गया था, उसका दृष्टान्त से स्पष्टीकरण करते है ।
जैसे आकाश वायु ओर रज के सम्बन्ध एवं स्पन्दन से मलिन, चलन आदि स्वभाववाला ज्ञात हो
जाता है, वैसे ही चिति के चित्तरूप स्पन्दन से चेत्य रूपी यह अनर्थजाल उपस्थित हो जाता हे