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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 44, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

दृश्यदर्शनसंबन्धस्पन्देनेयं जगद्गतिः । स्फुरत्यालोककुड्यादिसंगजा वर्णधीरिव ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त अर्थ में अन्वय-व्यतिरेक दिखलाते है । रामभद्र, दृश्य और दर्शन के सम्बन्धरूप स्पन्दन से यह संसार की गति उस प्रकार स्फुरित होती है, जिस प्रकार अनेक छिद्रों से प्रविष्ट सूर्यप्रकाश और दीवार के सम्बन्ध से चित्रविचित्र वर्णवुद्धि स्फुरित होती है