Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 44, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
यथा प्राप्तिक्षणे वस्तु प्रथमे तुष्टये तथा ।
न प्राप्त्येकक्षणादूर्ध्वमिति को नानुभूतवान् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
विषय तो नियमतः तुष्टि के साधन हैं, अतः उनमें राग का परित्याग कैसे किया जा सकता है ?
इस आशंका पर कहते हैं ।
भद्र, पहले प्राप्ति-समय में वस्तु जिस तरह तुष्टिसाधन होती है, उस तरह प्राप्ति के एक क्षण
बाद तुष्टिसाधन नहीं होती, इस विषय का किसने अनुभव नहीं किया है । निष्कर्ष यह निकला कि
प्राप्ति-क्षण छोड़कर पूर्व और उत्तर काल में विषयों में तुष्टिसाधनत्व का व्यभिचार हो जाने के कारण
विषय तुष्टिसाधन हैं, यह नियम नहीं रहा