Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 44, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
केवलेनेन्द्रियैः सार्धं वर्तमानार्थवर्तिना ।
असंगमेन मनसा यत्करोषि न तत्कृतम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि श्रीरामचन्द्रजी ने स्वकीय तत्त्वज्ञान-निष्ठा का वर्णन कर दिया तथापि उसकी परिपक्र-
दशा के पहले प्रच्युति न न हो जाय, इसलिए (स्थाणुनिखनन” न्याय से जीवन्मुक्तलक्षणरूप पूर्वोक्त
साधन परम्परा का ही प्रतिष्ठापन करनेवाले महाराज वस्निष्ठजी पूर्वोक्त अयत्नलम्य व्यवहारोपभोग
आदिरूप शिवार्चन में भी (सवरम्भा हि दोषेण“ इत्यादि भगवदुक्ति के अनुसार प्रमाद से हिंसादि
अनिष्टप्रसक्ति अवर्जनीयरूप से आ सकती है ओर उपभोग अनर्थ का बीज भी है, इसलिए पुनः जन्म
आदि अनर्थो की प्राप्ति होगी इस आशंका का परिहार करते हुए कहते हैं।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, इन्द्रियों के साथ रागादि से शून्य तथा कर्तृत्वाभिमानरूप
क्रियासम्बन्ध से वर्जित वर्तमानकालीन प्राप्त पदार्थो का व्यवहार करनेवाले अन्तःकरण से यदि आप
कुछ करते हों, तो वह किया गया नहीं माना जाता
सर्ग सन्दर्भ
तैंतालीसवाँ सर्ग समाप्त चौवालीसवाँ सर्म ज्ञान की दृढता के लिए इच्छा -त्याग से लेकर मनोविनाशपर्यत आसक्तिविनाश के उपायों का कथन |